मिट्टी की सेहत बची तो खेती बचेगी: गुरुकुल कुरुक्षेत्र में राष्ट्रपति मुर्मू का जैविक और प्राकृतिक खेती का आह्वान

 


तस्वीर: राष्ट्रपति भवन डिजिटल लाइब्रेरी (फाइल फोटो — कार्यक्रम की तस्वीर नहीं)

कुरुक्षेत्र। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने रविवार को कुरुक्षेत्र में कहा कि खेती की सेहत ही देश की सेहत है, और अगर मिट्टी की उर्वरता घटती रही तो इसका असर न केवल फसल पर, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर भी पड़ेगा। उन्होंने किसानों और समाज से जैविक और प्राकृतिक खेती को अधिक से अधिक अपनाने का आह्वान किया, ताकि मिट्टी की सेहत सुधरे, पर्यावरण बचे और खेती टिकाऊ बने।

राष्ट्रपति मुर्मू गुरुकुल कुरुक्षेत्र में स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक स्वामी श्रद्धानंद जी के बलिदान की शताब्दी के उपलक्ष्य में आयोजित समारोह और गुरुकुल की 114वीं स्थापना वर्षगांठ के कार्यक्रम में शामिल हुईं। इसी दिन उन्होंने कुरुक्षेत्र के ऐतिहासिक मां भद्रकाली शक्तिपीठ में दर्शन भी किए और देशवासियों के सुख, शांति, समृद्धि और कल्याण के लिए प्रार्थना की।

मिट्टी की घटती उर्वरता पर राष्ट्रपति की चिंता

यूएनआई की खबर के अनुसार, राष्ट्रपति मुर्मू ने अपने संबोधन में कृषि भूमि की घटती उर्वरता पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि टिकाऊ नहीं मानी जाने वाली कृषि पद्धतियों ने मिट्टी की उत्पादकता को प्रभावित किया है। उनका संदेश स्पष्ट था — खेती को केवल उत्पादन बढ़ाने के नजरिए से नहीं, बल्कि मिट्टी, पानी, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य को साथ लेकर चलने के नजरिए से देखना होगा।

राष्ट्रपति ने इस बात पर जोर दिया कि जैविक और प्राकृतिक खेती अपनाने से मिट्टी की सेहत बहाल हो सकती है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर अत्यधिक निर्भरता से मिट्टी की प्राकृतिक संरचना कमजोर होती है, और लंबे समय में इसका असर फसल की गुणवत्ता पर भी पड़ता है। प्राकृतिक खेती में मिट्टी के जीवंत तत्वों को बचाया जाता है, जिससे खेती लंबे समय तक उपजाऊ बनी रहती है।

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि कृषि भारत के विकास में केंद्रीय भूमिका निभाती है और करोड़ों लोगों की आजीविका खेती से जुड़ी हुई है। इसलिए मिट्टी की सेहत का सवाल केवल किसानों का सवाल नहीं है, बल्कि पूरे समाज और देश के भविष्य का सवाल है। खेती से जुड़े फैसले आज लिए जाएंगे, उनका असर आने वाली पीढ़ियों तक रहेगा।

गुरुकुल का 180 एकड़ प्राकृतिक खेती मॉडल

इसी समारोह में हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने गुरुकुल कुरुक्षेत्र की 180 एकड़ प्राकृतिक खेती सुविधा का उल्लेख किया, जहां रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के बिना फसलें उगाई जाती हैं। यूएनआई के अनुसार, मुख्यमंत्री ने इस सुविधा को हरियाणा और उत्तर भारत के किसानों के लिए एक मॉडल बताया।

मुख्यमंत्री ने कहा कि यह संस्थान दिखाता है कि पारंपरिक भारतीय मूल्य, आधुनिक वैज्ञानिक सोच और पर्यावरण के अनुकूल कृषि किस तरह मिलकर राष्ट्रीय विकास में योगदान दे सकते हैं। गुरुकुल की यह पहल इस बात का जीवंत उदाहरण है कि शिक्षा, संस्कार और खेती को एक साथ जोड़कर समाज को नई दिशा दी जा सकती है। उन्होंने शिक्षा को समाज के सबसे वंचित वर्गों तक पहुंचाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

गुरुकुल कुरुक्षेत्र की परंपरा शिक्षा और चरित्र निर्माण से जुड़ी रही है। ऐसे संस्थान में प्राकृतिक खेती का प्रयोग इस संदेश को मजबूत करता है कि ज्ञान केवल किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवनशैली और प्रकृति के साथ संतुलन में भी झलकता है। यही कारण है कि राष्ट्रपति की इस यात्रा को केवल एक औपचारिक कार्यक्रम के रूप में नहीं, बल्कि एक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।

स्वामी श्रद्धानंद जी की विरासत और आज की प्रासंगिकता

यह समारोह स्वामी श्रद्धानंद जी के बलिदान की शताब्दी के अवसर पर आयोजित हुआ। स्वामी श्रद्धानंद आर्य समाज के नेता, शिक्षाविद और स्वतंत्रता आंदोलन की महत्वपूर्ण शख्सियत थे। वर्ष 1926 में उनकी हत्या के सौ वर्ष पूरे होने पर देश उन्हें याद कर रहा है। गुरुकुल परंपरा से उनका गहरा संबंध रहा है, और शिक्षा के माध्यम से समाज सुधार उनका जीवन ध्येय था।

राष्ट्रपति मुर्मू की इस समारोह में उपस्थिति इस विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान देने का प्रतीक मानी जा रही है। श्रद्धानंद जी ने शिक्षा, स्वाभिमान और समाज सुधार को एक साथ आगे बढ़ाया था। आज जब देश पर्यावरण, स्वास्थ्य और टिकाऊ विकास की चुनौतियों से जूझ रहा है, तब उनकी शिक्षा और प्रकृति के प्रति सम्मान की सोच और भी प्रासंगिक हो जाती है।

गुरुकुल की 114वीं स्थापना वर्षगांठ भी इस अवसर को विशेष बनाती है। एक सदी से अधिक पुरानी यह संस्था पीढ़ियों से विद्यार्थियों को शिक्षा और संस्कार दे रही है। राष्ट्रपति का यहां आना और मिट्टी की सेहत जैसे विषय को उठाना इस बात का संकेत है कि परंपरा और आधुनिक चुनौतियों के बीच सेतु बनाना आज की सबसे बड़ी जरूरत है।

किसानों के लिए संदेश: प्रकृति के साथ खेती

राष्ट्रपति मुर्मू के संबोधन का सबसे अहम संदेश किसानों के लिए था। उन्होंने पर्यावरण के अनुकूल खेती के तरीकों को अपनाने की अपील की। जैविक और प्राकृतिक खेती से न केवल मिट्टी की उर्वरता लौटती है, बल्कि किसानों की लागत भी नियंत्रित हो सकती है और उपज की गुणवत्ता भी बेहतर होती है। लंबे समय में यही खेती किसानों को आत्मनिर्भर बनाती है।

विशेषज्ञ भी मानते हैं कि मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए फसल चक्र, जैविक खाद, हरी खाद और प्राकृतिक कीट प्रबंधन जैसे उपाय अपनाने जरूरी हैं। गुरुकुल का 180 एकड़ मॉडल किसानों को यह दिखाता है कि बिना रसायनों के भी खेती संभव है और उसे बड़े पैमाने पर अपनाया जा सकता है। ऐसे मॉडल किसानों के लिए सीखने का केंद्र बन सकते हैं।

इस अवसर पर राष्ट्रपति की कुरुक्षेत्र यात्रा का व्यापक संदर्भ भी याद रखने योग्य है। राष्ट्रपति भवन के अनुसार, राष्ट्रपति मुर्मू 31 अक्टूबर को नाशिक में सिंहस्थ महाकुंभ के ध्वज समारोह में शामिल हुईं और 1 नवंबर को कुरुक्षेत्र में हरियाणा के गठन के 60 वर्ष पूरे होने के हीरक जयंती समारोह में भी शामिल हुईं। गुरुकुल का कार्यक्रम इसी यात्रा का हिस्सा था।

आगे की राह

राष्ट्रपति मुर्मू का यह संदेश ऐसे समय में आया है, जब देश में टिकाऊ खेती, जलवायु परिवर्तन और खाद्य सुरक्षा पर गंभीर चर्चा हो रही है। मिट्टी की सेहत को बचाना केवल कृषि विभाग का काम नहीं है, बल्कि इसमें किसान, वैज्ञानिक, शिक्षण संस्थान और समाज सभी की भूमिका है। गुरुकुल जैसे संस्थान इस दिशा में प्रयोग और शिक्षा के माध्यम से मार्गदर्शन कर सकते हैं।

समारोह से निकला संदेश साफ है — मिट्टी बचेगी तो खेती बचेगी, खेती बचेगी तो गांव और किसान मजबूत होंगे, और किसान मजबूत होंगे तो देश का भविष्य सुरक्षित होगा। राष्ट्रपति का आह्वान है कि जैविक और प्राकृतिक खेती को आंदोलन का रूप दिया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियों को उपजाऊ मिट्टी, स्वस्थ भोजन और स्वच्छ पर्यावरण मिल सके।

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स्रोत: यूएनआई (1 नवंबर 2026, कुरुक्षेत्र), राष्ट्रपति भवन की यात्रा सूचना (31 अक्टूबर–1 नवंबर 2026)।

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